देहरादून। उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा कि वन एवं वन्यजीव संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। वन्यजीवों का संरक्षण केवल उन्हें बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा उत्तराखंड तैयार करना होगा, जहां विकास की राह आगे बढ़े, लेकिन वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन के रास्ते बाधित न हों।
राज्यपाल गुरुवार को लोक भवन, देहरादून में आयोजित वन्यजीव सप्ताह-2026 के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने वन्यजीव संरक्षण के लिए जनभागीदारी, वैज्ञानिक तकनीकों के इस्तेमाल और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
प्राकृतिक आवास और वन्यजीव गलियारों का संरक्षण जरूरी
राज्यपाल ने कहा कि वन्यजीवों को केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित रखकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। बाघों के लिए स्वस्थ जंगल, हाथियों के लिए सुरक्षित गलियारे, पक्षियों के लिए सुरक्षित आकाश और सभी वन्यजीवों के लिए स्वच्छ जल तथा आपस में जुड़े प्राकृतिक आवास आवश्यक हैं।
उन्होंने कहा कि वन्यजीवों की जरूरतों को समझना और उनके लिए सुरक्षित आवास, पर्याप्त भोजन तथा निर्बाध आवागमन की व्यवस्था करना जरूरी है। जब वन्यजीवों को जंगलों में पर्याप्त भोजन और सुरक्षित रास्ते नहीं मिलते, तो वे मानव बस्तियों की ओर आने के लिए मजबूर हो सकते हैं। ऐसे में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका रहती है।
राज्यपाल ने कहा कि इस समस्या का स्थायी समाधान संघर्ष बढ़ाने में नहीं, बल्कि वन्यजीवों की आवश्यकताओं को समझते हुए सह-अस्तित्व का रास्ता तलाशने में है। मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए संवेदनशीलता और समरसता की सोच अपनानी होगी।
आधुनिक तकनीक से कम होगा मानव-वन्यजीव संघर्ष
राज्यपाल ने वन्यजीव संरक्षण में आधुनिक तकनीक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि 21वीं सदी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), कैमरा ट्रैप, रिमोट सेंसिंग, जियोस्पेशियल मैपिंग, कॉलर आइडेंटिफिकेशन और आधुनिक डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकों ने संरक्षण के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं।
इन तकनीकों के माध्यम से वन्यजीवों की गतिविधियों, आवागमन और व्यवहार को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इससे वन्यजीवों की निगरानी, उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि तकनीक का प्रभावी उपयोग मनुष्य और वन्यजीवों, दोनों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने में सहायक होगा।
मानव और वन्यजीवों की सुरक्षा पर समान ध्यान
राज्यपाल ने कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान के लिए ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें मनुष्य की सुरक्षा के साथ वन्यजीवों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। उत्तराखंड सरकार द्वारा मानव-वन्यजीव संघर्ष को आपदा के रूप में स्वीकार करना और जिला स्तर पर इसके न्यूनीकरण एवं प्रबंधन के लिए समितियों का गठन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने संरक्षण के प्रयासों में सरकारी विभागों के साथ स्थानीय समुदायों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की भागीदारी को भी आवश्यक बताया।
‘जुड़े हुए आवास, समृद्ध वन्यजीवन’ रही इस वर्ष की थीम
उत्तराखंड वन विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में वन्यजीव सप्ताह का आयोजन किया जाता है। इसी क्रम में वर्ष 2026 में वन्यजीव सप्ताह का शुभारंभ 1 अक्टूबर को भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) के सहयोग से देहरादून स्थित आईसीएफआरई ऑडिटोरियम में किया गया। इसका समापन 8 अक्टूबर को लोक भवन में राज्यपाल की उपस्थिति में हुआ।
इस वर्ष वन्यजीव सप्ताह की थीम ‘जुड़े हुए आवास, समृद्ध वन्यजीवन’ रखी गई। इसके अंतर्गत संरक्षित क्षेत्रों के साथ-साथ वन्यजीव गलियारों और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया।
प्रमुख वन संरक्षक कपिल लाल ने कहा कि वन्यजीव सप्ताह का मुख्य उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों के निकट मानव आबादी होने के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वन विभाग इस चुनौती को कम करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
वनकर्मियों को किया सम्मानित, बिनसर अभयारण्य के लोगो का विमोचन
समारोह के दौरान राज्यपाल ने वन एवं वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सराहनीय योगदान देने वाले वन विभाग के कार्मिकों को सम्मानित किया। इसके साथ ही अल्मोड़ा स्थित बिनसर वन्यजीव अभयारण्य के लोगो का भी विमोचन किया गया।
कार्यक्रम में सांसद नरेश बंसल, सचिव सी. रविशंकर, प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) नीना ग्रेवाल सहित वन विभाग के अधिकारी और विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
राज्यपाल का संदेश स्पष्ट था कि वन्यजीव संरक्षण को केवल सरकारी अभियान मानने के बजाय जनभागीदारी से जुड़ा सामाजिक दायित्व बनाया जाए, ताकि उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।