पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का निधन, उत्तराखंड में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय नेता और भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी भुवन चंद्र खंडूड़ी का आज निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी के निधन की खबर सामने आते ही पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई। देहरादून स्थित उनके आवास पर पिछले कई दिनों से नेताओं, शुभचिंतकों और परिजनों के आने-जाने का सिलसिला जारी था।

मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी भारतीय राजनीति में ईमानदारी, अनुशासन और सादगी की मिसाल माने जाते थे। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और जल्द ही अपनी साफ-सुथरी छवि के कारण जनता के बीच लोकप्रिय हो गए। बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें राजनीति में लेकर आए थे। वर्ष 1990 के दशक में जब खंडूड़ी सेना से रिटायर होकर देहरादून लौटने की तैयारी कर रहे थे, उसी दौरान भाजपा नेतृत्व ने उनकी कार्यशैली और राष्ट्रसेवा के अनुभव को राजनीति में उपयोग करने का निर्णय लिया।

भुवन चंद्र खंडूड़ी पांच बार सांसद चुने गए और उत्तराखंड के चौथे मुख्यमंत्री बने। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त छवि बनाई। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रदेश में प्रशासनिक सुधार, सड़क निर्माण, विकास योजनाओं और जवाबदेह शासन को प्राथमिकता दी। उनकी स्पष्टवादिता और ईमानदार कार्यशैली के कारण उन्हें जनता और राजनीतिक गलियारों में विशेष सम्मान प्राप्त था।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे उत्तराखंड और राष्ट्रीय राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि खंडूड़ी जी ने भारतीय सेना में रहते हुए राष्ट्र सेवा, अनुशासन और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। सैन्य जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक उनका पूरा व्यक्तित्व राष्ट्रहित और जनसेवा के प्रति समर्पित रहा।

धामी ने कहा कि एक जननेता के रूप में खंडूड़ी जी ने उत्तराखंड के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए और अपनी सादगी, स्पष्टवादिता तथा कार्यकुशलता से लोगों के दिलों में विशेष स्थान बनाया। उनके निधन से उत्तराखंड ने एक ऐसे नेता को खो दिया है जिसकी पहचान ईमानदार राजनीति और अनुशासित नेतृत्व के रूप में हमेशा याद की जाएगी।

प्रदेशभर में भाजपा कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और आम लोगों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। उनके निधन से उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसकी भरपाई कर पाना आसान नहीं होगा।

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