उत्तरकाशी।तांबाखानी सुरंग के समीप बनाए गए अवैध कूड़ा डंपिंग जोन के खिलाफ चल रहे जन-आंदोलन ने गुरुवार को 63 दिन पूरे कर लिए। दो महीने से अधिक समय से जारी इस संघर्ष को अब पत्रकार संगठनों का भी खुला समर्थन मिल गया है। नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ Uttarakhand) के प्रादेशिक पदाधिकारियों ने धरना स्थल पहुंचकर आंदोलनकारियों की मांगों को जायज ठहराया और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
धरना स्थल पर यूनियन की प्रदेश अध्यक्ष दया जोशी, मार्गदर्शक एवं संरक्षक त्रिलोक चंद्र भट्ट और प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य प्रमोद कुमार विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता गोपीनाथ रावत के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को नैतिक समर्थन देते हुए कहा कि यह लड़ाई केवल एक डंपिंग जोन हटाने की नहीं, बल्कि उत्तरकाशी की पर्यावरणीय अस्मिता बचाने की है।
धरने को संबोधित करते हुए त्रिलोक चंद्र भट्ट ने कहा कि उत्तरकाशी वैश्विक धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण शहर है, जहां से चारधाम यात्रा का प्रमुख मार्ग गुजरता है। ऐसे में शहर के प्रवेश द्वार पर कूड़े का अंबार न केवल तीव्र दुर्गंध फैला रहा है, बल्कि देवभूमि की छवि को भी धूमिल कर रहा है। उन्होंने कहा कि पॉलीथीन और प्लास्टिक का यह ढेर जल, थल और वायु तीनों को प्रदूषित कर रहा है तथा बेजुबान पशुओं के लिए भी घातक साबित हो रहा है।
यूनियन पदाधिकारियों ने जिला प्रशासन, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका पर भी तीखा प्रहार किया। उनका कहना था कि धरातल पर ठोस कार्रवाई के बजाय केवल औपचारिकता निभाई जा रही है। तांबाखानी जैसी संवेदनशील और घनी आबादी के समीप स्थित जगह को डंपिंग जोन के रूप में उपयोग करना पर्यावरणीय मानकों और नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। आंदोलन के 63 दिन बीत जाने के बावजूद स्थायी ट्रेंचिंग ग्राउंड तिलोथ में निर्माण की दिशा में कोई ठोस प्रगति न होना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
धरना दे रहे आंदोलनकारियों ने मांग दोहराई कि तांबाखानी सुरंग के पास से अवैध डंपिंग जोन को तत्काल हटाया जाए और वैज्ञानिक पद्धति से कूड़ा निस्तारण के लिए स्थायी ट्रेंचिंग ग्राउंड का निर्माण किया जाए। साथ ही क्षेत्र में फैल रहे प्रदूषण को रोकने के लिए प्रभावी और स्थायी कदम उठाए जाएं।
नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (एनयूजे उत्तराखंड) ने आश्वासन दिया कि पर्यावरण और लोकहित से जुड़े इस गंभीर मुद्दे को शासन स्तर पर मजबूती से उठाया जाएगा। पत्रकारों के इस समर्थन से आंदोलन को नई ऊर्जा मिली है और अब प्रशासन पर शीघ्र निर्णय लेने का दबाव और बढ़ गया है।